Samudra Manthan जी हाँ यह नाम लेते ही हमारे दिमाग में जो सबसे पहली चीज़ आती है वो हैं अमृत. यह सतयुग में चाक्षुष मन्वन्तर के दौरान हुआ था और यह घटना आज से करोड़ों वर्ष पूर्व घटित हुई थी. यह अपने आप में एक ऐसी अलौकिक और विशाल घटना थी, जिसमे एक और देवता थे और दूसरी और असुर थे. दोनों ने मिलकर अमृत की प्राप्ति के लिए क्षीर सागर का मंथन किया था.

समुन्द्र मंथन के दौरान भगवान विष्णु को तो विशेष अवतार धारण करने पड़े थे. पहला कूर्म अवतार और दूसरा मोहिनी अवतार हैं. आज के इस लेख में हम इस पूरी पौराणिक गाथा और इसके पीछे के कारणों और इससे जुड़ें हर एक महत्वपूर्ण पहलू को विस्तार से जानेंगे.
Samudra Manthan क्यों करना पड़ा था ?
इस कथा की शुरुआत स्वर्ग के राजा देवराज को मिले एक श्राप से होती हैं. एक बार परम तपस्वी महर्षि दुर्वासा ने देवराज इंद्र को एक दिव्य और एक अत्यंत पवित्र माला भेंट की थी. इंद्र ने ऐश्वर्य के अभिमान में आकर उस माला का सम्मान नहीं किया था और उसे अपने ऐरावत हठी के मस्तक पर रख दिया. हाथी ने उसे जमीन पर फेंककर अपने पैरों से कुचल दिया था.
अपनी भेंट का ऐसा घोर अनादर देखकर महर्षि दुर्वासा को गुस्सा आ गया और उन्होंने उसी समय देवराज इंद्र और सभी देवताओं को श्रीहीन यानि लक्ष्मीविहीन होने और शक्तिहीन होने का श्राप दे दिया था. महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब देवी लक्ष्मी स्वर्ग से विलुप्त हुईं, तो वह क्षीर सागर (समुद्र मंथन का स्थान) में समाहित हो गईं. इसके अलावा श्राप के प्रभाव से स्वर्ग का ऐश्वर्य समाप्त हो गया और देवताओं का तेज नष्ट होने लगा.
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इसी दुर्बलता का लाभ उठाकर असुरों के राजा बलि ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया. अपनी खोई हुई शक्ति को वापस पाने के लिए सभी देवता भगवान ब्रह्मा को साथ लेकर भगवान विष्णु की शरण में जा पहुंचे. तब श्री हरि विष्णु ने उन्हें क्षीर सागर का मंथन करके अमृत (Amrit) निकालने का मार्ग बताया था.
मंथन की तैयारी
अमृत निकालने का यह कार्य इतना विशाल और बड़ा था कि इसे अकेले ना तो देवता संपन्न कर सकते थे और ना ही असुर कर सकते थे. ऐसे में भगवान विष्णु की आज्ञा से देवताओं ने असुरों के साथ संधि की और उन्हें भी अमृत में हिस्सा देने का लालच देकर इस कार्य के लिए तैयार किया गया था.
- मंथनी (Churning Rod): समुद्र को मथने के लिए एक विशाल मन्दराचल पर्वत (Mandarachala Mountain) को चुना गया था.
- नेती/रस्सी (Churning Rope): नागराज वासुकि (Vasuki) को पर्वत के चारों ओर लपेटकर रस्सी का रूप दिया गया।
जब Samudra Manthan प्रारंभ होने लगा, तो असुरों ने अपने अहंकार के कारण वासुकि नाग के मुख वाले हिस्से की तरफ रहने की जिद की. देवताओं ने भगवान विष्णु के संकेत पर नाग के पूंछ वाले हिस्से को संभाला. इस प्रकार क्षीर सागर के बीच इतिहास का सबसे बड़ा मंथन प्रारंभ हुआ था.
भगवान विष्णु का कूर्म अवतार
जैसे ही समुद्र का मंथन तीव्र हुआ, एक भीषण समस्या खड़ी हो गई. मन्दराचल पर्वत के नीचे कोई ठोस आधार नहीं था, जिसके कारण वह भारी पर्वत धीरे-धीरे समुद्र के कीचड़ और जल में धंसने लगा. इससे पर्वत के नीचे जाने से पूरा मंथन रुक गया और देवता व असुर असहाय हो गए.
तब भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा और इस कार्य को पूर्ण करने के लिए अपना दूसरा अवतार धारण किया, जिसे कूर्म अवतार (Kurma Avatar) यानी कछुआ अवतार कहा जाता है.
भगवान विष्णु ने एक अत्यंत विशाल कछुए का रूप धारण किया और समुद्र के तल में प्रवेश कर गए. उन्होंने मन्दराचल पर्वत को अपनी अभेद्य और विशाल पीठ पर उठा लिया. कछुए की पीठ का सुदृढ़ आधार मिलते ही पर्वत पूरी तरह स्थिर हो गया और इसके बाद Samudra Manthan सुचारू रूप से आगे बढ़ सका था.
समुद्र मंथन से प्रकट हुए 14 रत्न
क्षीर सागर के इस महामंथन से एक के बाद एक 14 दिव्य रत्न और शक्तियां बाहर निकलीं थी, जिनका वितरण देवताओं, असुरों और ऋषियों के बीच हुआ:
- हलाहल (विष): मंथन से सबसे पहले अत्यंत भयंकर जहर निकला, जिससे पूरी सृष्टि जलने लगी. संसार को बचाने के लिए भगवान शिव ने इस विष को पी लिया था और अपने कंठ में रोक लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए।
- कामधेनु: यह समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली दिव्य गाय है, जिसे यज्ञ आदि पवित्र कार्यों के लिए ऋषियों को सौंप दिया गया था.
- उच्चैःश्रवा: सात मुखों वाला अत्यंत तीव्र गति से उड़ने वाला सफेद घोड़ा, जिसे असुर राज बलि ने अपने पास रखा था.
- ऐरावत: दिव्य और अदभुत चमक वाला चार दांतों वाला सफेद हाथी, जिसे देवराज इंद्र ने अपना वाहन बनाया.
- कौस्तुभ मणि: अत्यंत चमकदार और अलौकिक मणि, जिसे भगवान विष्णु ने अपने हृदय पर धारण किया था.
- पारिजात वृक्ष: दिव्य कल्पवृक्ष जिसके फूल कभी नहीं मुरझाते, इसे स्वर्ग में स्थापित किया गया था.
- कल्पवृक्ष: सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला स्वर्गीय वृक्ष.
- अप्सरा रंभा: अत्यंत सुंदर और कलाओं में निपुण अप्सरा, जो देवलोक गईं.
- देवी लक्ष्मी: धन, समृद्धि और ऐश्वर्य की देवी, जिन्होंने प्रकट होते ही भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चुना.
- वारुणी: मदिरा की देवी, जिसे असुरों ने स्वीकार किया था.
- शंख (पाञ्चजन्य): पवित्रता और विजय की ध्वनि करने वाला दिव्य शंख, जो भगवान विष्णु के पास गया.
- चंद्रमा: शीतलता के प्रतीक, जिन्हें भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण किया.
- धन्वंतरि वैद्य: आयुर्वेद के जनक और देवताओं के चिकित्सक.
- अमृत कलश: धन्वंतरि जी इसको लेकर समुद्र से प्रकट हुए थे
मोहिनी अवतार और अमृत का वितरण
जैसे ही भगवान धन्वंतरि Samudra Manthan से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, उन्होंने देवताओं के हिस्से का आधा अमृत उन्हें दिया और अपने हिस्से का अमृत लेकर भाग गए और आपस में ही उसे पहले पीने के लिए लड़ने लगे.
देवताओं के सामने पुनः संकट खड़ा हो गया, क्योंकि यदि असुर अमर हो जाते तो सृष्टि पर अधर्म का राज हो जाता. ऐसे में भगवान विष्णु ने संसार की सबसे सुंदर स्त्री का रूप धारण किया, जिसे मोहिनी अवतार (Mohini Avatar) कहा जाता है.
मोहिनी का सम्मोहन
मोहिनी अपने अलौकिक सौंदर्य और मधुर वाणी के साथ असुरों के मध्य जा पहुंची. उसके रूप से सम्मोहित होकर असुर अपनी आपसी लड़ाई भूल गए और उन्होंने अमृत बांटने का पूरा उत्तरदायित्व मोहिनी को ही सौंप दिया.
मोहिनी ने बड़ी चतुरता से देवताओं और असुरों को दो अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया. वह असुरों को अपने रूप और बातों में उलझाए रही और सारा अमृत देवताओं को पिलाती चली गई.
राहु-केतु की कथा
इस वितरण के दौरान स्वरभानु नामक एक असुर चालाकी से रूप बदलकर देवताओं की पंक्ति में बैठ गया और उसने अमृत की कुछ बूंदें पी लीं. सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और मोहिनी रूपी भगवान विष्णु को सूचित कर दिया.
अमृत उसके गले से नीचे उतरता, उससे पहले ही भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया. परंतु अमृत की बूंदें गले तक पहुंच चुकी थीं, इसलिए उसका सिर राहु और धड़ केतु के नाम से अमर हो गया. अमृत समाप्त होने पर मोहिनी रूप समाप्त हो गया और देवता पुनः शक्तिशाली होकर स्वर्ग लौट गए.
निष्कर्ष (Conclusion)
समुद्र मंथन, कूर्म अवतार और मोहिनी रूप की यह संपूर्ण कथा सनातन परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण प्रसंगों में से एक है. यह कथा बताती है कि किस प्रकार भगवान विष्णु ने हर संकट के समय अवतार लेकर सृष्टि के संतुलन को बनाए रखा और देवताओं को उनका खोया हुआ स्थान वापस दिलाया था.
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